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APSU की बड़ी लापरवाही या सुनियोजित अनदेखी? परीक्षा देने वाले छात्र को रिकॉर्ड में किया ‘गायब’, CM हेल्पलाइन पर भी भ्रामक जवाब से उठा बवाल

APSU की बड़ी लापरवाही या सुनियोजित अनदेखी? परीक्षा देने वाले छात्र को रिकॉर्ड में किया ‘गायब’, CM हेल्पलाइन पर भी भ्रामक जवाब से उठा बवाल
 साहिल खान शहडोल/रीवा

मध्यप्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय (APSU), रीवा से जुड़ा है, जहां एक छात्र की मेहनत, उसके दस्तावेज और कॉलेज रिकॉर्ड सब कुछ मौजूद होने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसे ऐसा झटका दिया है, जिसने उसके भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। यह मामला केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त लापरवाही, जवाबदेही की कमी और संवेदनहीन रवैये की भयावह तस्वीर पेश करता है।

धनपुरी निवासी आयुष अग्रवाल, जो शासकीय नेहरू महाविद्यालय बुढार का छात्र है, ने अगस्त 2024 में बी.ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा विधिवत दी थी। छात्र के पास परीक्षा में उपस्थित होने के पुख्ता प्रमाण के तौर पर उपस्थिति पत्रक और संबंधित प्रश्नपत्र मौजूद हैं। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने उसकी अंकसूची में ‘टूरिज्म ट्रांसपोर्ट’ और ‘इंटर्नशिप’ विषयों में अनुपस्थित (Absent) दर्शाते हुए उसे असफल घोषित कर दिया। हैरानी की बात यह है कि जिन परीक्षाओं में छात्र शामिल हुआ, जिनके रिकॉर्ड कॉलेज में दर्ज हैं, उन्हीं विषयों में उसे सिस्टम से गायब कर दिया गया।

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब छात्र ने न्याय की उम्मीद में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 पर शिकायत दर्ज कराई। उम्मीद थी कि विश्वविद्यालय अपनी गलती सुधारते हुए छात्र को राहत देगा, लेकिन आरोप है कि APSU प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकारने के बजाय पोर्टल पर यह जवाब दर्ज करा दिया कि छात्र परीक्षा में उपस्थित ही नहीं हुआ था। सवाल यह है कि जब छात्र के पास उपस्थिति के दस्तावेज हैं और कॉलेज रिकॉर्ड उसकी परीक्षा उपस्थिति को प्रमाणित कर रहे हैं, तो विश्वविद्यालय ने ऐसा जवाब किस आधार पर दिया? क्या यह अपनी गलती छुपाने का प्रयास था या शिकायत को दबाने की कोशिश?

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू कॉलेज लेजर में दर्ज अंक हैं। नेहरू कॉलेज बुढार के आधिकारिक रिकॉर्ड में आयुष अग्रवाल को इंटर्नशिप विषय में 65 अंक प्राप्त होना दर्ज है, लेकिन जब यही परिणाम विश्वविद्यालय की मार्कशीट में पहुंचा तो अंक रहस्यमय तरीके से शून्य में बदल गए। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर कॉलेज से विश्वविद्यालय तक जाते-जाते अंक कहां गायब हो गए? क्या यह तकनीकी गड़बड़ी थी, डेटा एंट्री की लापरवाही या फिर किसी स्तर पर गंभीर प्रशासनिक चूक?

छात्र का आरोप है कि जब वह अपनी समस्या लेकर विश्वविद्यालय पहुंचा, तो समाधान देने के बजाय उसे अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। कथित तौर पर अधिकारियों ने उससे साफ शब्दों में कह दिया कि अब उसकी कॉपी नहीं मिल सकती और उसे फिर से प्रथम वर्ष में प्रवेश लेना होगा। यदि यह आरोप सही है, तो यह न केवल एक छात्र के भविष्य के प्रति असंवेदनशीलता है बल्कि यह दर्शाता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी गलती सुधारने के बजाय छात्र पर ही उसका बोझ डालना चाहता है।

इस मामले ने APSU की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि छात्र वास्तव में असफल था, तो उसे अगले वर्षों में प्रवेश कैसे मिला? उसकी फीस और रजिस्ट्रेशन क्यों स्वीकार किए गए? जब कॉलेज रिकॉर्ड में अंक दर्ज हैं, तो विश्वविद्यालय के डिजिटल सिस्टम में वे शून्य कैसे हो गए? और सबसे बड़ा सवाल—क्या एक प्रशासनिक गलती की कीमत एक छात्र को अपने तीन साल गंवाकर चुकानी पड़ेगी?

विश्वविद्यालय से निराश होकर आयुष अग्रवाल ने अब कलेक्टर शहडोल और रीवा संभाग के कमिश्नर को लिखित शिकायत सौंपते हुए न्याय की गुहार लगाई है। छात्र ने मांग की है कि उसकी अंकसूची तत्काल सुधारी जाए, उसे तृतीय वर्ष की परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए और इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

यह मामला केवल एक छात्र की परेशानी नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। एक ओर सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर एक छात्र अपने ही परीक्षा परिणाम को साबित करने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकने को मजबूर है। यदि समय रहते इस मामले में निष्पक्ष जांच और सुधारात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह न केवल एक प्रतिभाशाली छात्र के भविष्य को अंधकार में धकेलेगा बल्कि विश्वविद्यालय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात होगा।

अब देखना यह है कि APSU इस मामले में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर छात्र को न्याय देता है या फिर शिक्षा व्यवस्था की यह चूक एक और युवा के सपनों को कुचल देती है।

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