मार्तंड शासकीय महाविद्यालय कोतमा में प्रभारी प्राचार्य को लेकर घमासान
ज्ञानेंद्र पांडेय 8516868379
अनूपपुर
जिले के प्रतिष्ठित मार्तंड शासकीय महाविद्यालय, कोतमा में प्रभारी प्राचार्य के पद को लेकर चल रहा विवाद अब केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना, राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक निष्क्रियता जैसे गंभीर सवालों को जन्म दे रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पूर्व में महाविद्यालय में प्राचार्य सोनवानी पदस्थ थे। उनके स्थानांतरण के बाद वरिष्ठता, योग्यता एवं अनुभव के आधार पर डॉ. जबेदियुस लकड़ा को प्रभारी प्राचार्य नियुक्त किया गया था। लेकिन कुछ ही समय बाद, बिना किसी स्पष्ट कारण अथवा लिखित आदेश के, डॉ. लकड़ा को हटाकर डॉ. मिश्रा को प्रभारी प्राचार्य बना दिया गया।
बताया जा रहा है कि यह निर्णय राजनीतिक दबाव और राजधानी से आए एक कथित फोन कॉल के बाद लिया गया, जिससे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।
इस निर्णय से आहत होकर डॉ. लकड़ा ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर की शरण ली। मामले की सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने दिनांक 19-12-2025 के विवादित आदेश के प्रभाव एवं संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी और डॉ. लकड़ा के पक्ष में स्पष्ट अंतरिम आदेश पारित किया।
न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि प्रतिवादी शासन एवं विभागीय अधिकारी तीन सप्ताह के भीतर जवाबदावा प्रस्तुत करें।
प्रभार सौंपने से इनकार, अवमानना का खतरा
न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति लेकर जब डॉ. लकड़ा महाविद्यालय पहुँचे और पुनः प्रभारी प्राचार्य का कार्यभार ग्रहण करना चाहा, तो वर्तमान प्रभारी प्राचार्य डॉ. मिश्रा ने प्रभार देने से साफ इनकार कर दिया।इस घटनाक्रम के बाद शिक्षा जगत में यह सवाल गूंजने लगा है कि क्या अब न्यायालय के आदेश भी प्रभावहीन हो चुके हैं? क्या राजनीतिक संरक्षण न्यायपालिका से भी ऊपर है?
राजनीतिक संरक्षण और ‘एक फोन कॉल’ की चर्चा
सूत्रों के अनुसार, वर्तमान प्रभारी प्राचार्य डॉ. मिश्रा को स्थानीय राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है तथा विभागीय अधिकारियों से भी उनके घनिष्ठ संबंध बताए जा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि राजधानी के किसी प्रभावशाली व्यक्तिजिसका नाम भार्गव बताया जा रहा हैके एक फोन कॉल पर ही पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को दरकिनार कर दिया गया।
यदि यह तथ्य सत्य हैं, तो यह न केवल शिक्षा विभाग बल्कि शासन-प्रशासन की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी गहरा आघात है।
न्यायपालिका की गरिमा और शिक्षा व्यवस्था की साख दांव पर
यह मामला अब केवल एक प्रभारी प्राचार्य की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा, प्रशासनिक जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ चुका है।
यदि उच्च न्यायालय के आदेशों की इस प्रकार खुलेआम अनदेखी होती रही, तो आम नागरिक का कानून और व्यवस्था पर विश्वास कैसे बना रहेगा यह सबसे बड़ा प्रश्न है।
अब शासन की भूमिका पर टिकी निगाहें
फिलहाल, डॉ. जबेदियुस लकड़ा अपने वैधानिक अधिकार और न्याय के लिए संघर्षरत हैं, जबकि महाविद्यालय में अनिश्चितता, असंतोष और अस्थिरता का माहौल बना हुआ है।
अब देखना यह है कि शासन और उच्च शिक्षा विभाग इस पूरे प्रकरण पर कब संज्ञान लेते हैं, न्यायालय के आदेशों का पालन कब सुनिश्चित कराते हैं, और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है।
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