नई शिक्षा नीति अंतर्गत मृदा परीक्षण विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित
शहडोल विजय भूमिया
कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डा. मृगेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में शासकीय इंदिरा गांधी होम साइंस कॉलेज शासकीय एवं पंडित शम्भुनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल के विद्यार्थियों ने नई शिक्षा नीति अंतर्गत मृदा परीक्षण विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहभागिता निभाई। प्रषिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिषोर प्रजापति ने विद्यार्थियों को बताया कि मृदा परीक्षण या भूमि की जांच मिट्टी की रासायनिक, भौतिक और जैविक विशेषताओं का विश्लेषण करने की एक प्रक्रिया है, ताकि उसकी उर्वरकता का पता लगाया जा सके और यह निर्धारित किया जा सके कि उसमें कौन से पोषक तत्वों की कमी है।
मृदा परीक्षण के लिए सबसे पहले मृदा का नमूना लिया जाता है। इसके लिए जरूरी है कि मृदा का नमूना पूरे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करे। यदि मृदा का नमूना ठीक ढंग से नहीं लिया गया हो और वह मृदा का सही प्रतिनिधित्व न कर रहा हो, तो भले ही मृदा परीक्षण में कितनी ही सावधानियां क्यों न बरती जाएं, उसकी सिफारिश सही नहीं हो सकती। इसलिए खेत की मृदा का नमूना उस स्थान से न लें, जहां पर खाद, उर्वरक, मेड़ों, पेड़ों, रास्तों के पास आदि को इकट्ठा किया गया हो। एकत्रित की गई पूरी मृदा को हाथ से अच्छी तरह से मिला लें तथा साफ कपड़े पर डालकर गोल ढेर बना लें। अंगुली से ढेर के चार बराबर भागों की मृदा अलग हटा दें। अब शेष दो भागों की मृदा पुनः अच्छी तरह से मिला लें व गोल बनायें। यह प्रक्रिया तब तक दोहरायें, जब तक लगभग आधा कि.ग्रा. मृदा शेष रह जायेे। मृदा नमूने को साफ प्लास्टिक थैली में रखें तथा इसे एक कपड़े की थैली में डाल दें। नमूने के साथ एक सूचना पत्रक, जिस पर समस्त जानकारी लिखी हो, एक प्लास्टिक की थैली में अन्दर तथा एक कपड़े की थैली के बाहर बांध दें। अब इन तैयार नमूनों को मृदा परीक्षण प्रयोगशाला भेजें।
मृदा परीक्षण प्रयोगशाला शहडोल से डॉ. प्रदीप राणा ने विद्यार्थियों को जानकारी दी कि पौधों की वृद्धि एवं समुचित विकास के लिये 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें से किसी एक की कमी हो जाने से पौधों पर विपरीत असर होता है और उसके विकास के साथ-साथ उत्पादन में भी फर्क पडने लगता है। बढ़ती जनसंख्या, घटती जोत और कम क्षेत्र से अधिक अन्न उत्पादन की दौड़ में भूमि से पोषक तत्वों का दोहन कई गुना अधिक होने लगा है, परिणाम स्वरूप भूमि की दशा में उसके स्वास्थ्य पर विपरीत असर देखा जाने लगा।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड जिस पर निम्न जानकारी जैसे मृदा का पी.एच. मान, ई.सी, कार्बनिक पदार्थ, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, लोहा, कॉपर, मैग्नीज, बोरान, अंकित कर कृषकों को उपलब्ध कराया जाता है। जिससे कृषक अपनी फसलानुसार, क्षेत्र अनुसार संतुलित उर्वरकों का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकें। यदि हमें मिट्टी की सुरक्षा करनी है तो उसके बारे में जानकारी होनी भी जरूरी है। मिट्टी की शक्ति और उसकी स्थिति के बारे में हमें तभी जानकारी हो पाएगी, जब हम उसका समय-समय पर परीक्षण कराते रहे। यह किसानों को फसलों के लिए सही मात्रा में उर्वरकों और आवश्यक मृदा सुधारकों का उपयोग करने में मदद करता है।
0 Comments