दरी पर सत्ता, लाठी पर सवाल
धनपुरी में विकास के साथ विरोध का भी लोकार्पण
शहडोल दिनेश चौधरी
नगर पालिका वार्ड क्रमांक 2 स्थित वाटर पार्क के लोकार्पण अवसर पर मुख्यमंत्री के आगमन ने धनपुरी को एक ऐसा मंच दे दिया, जहां विकास, लोकतंत्र और राजनीति—तीनों की असल तस्वीर एक ही दिन, एक ही समय, अलग-अलग जगहों पर दिखाई दी। फर्क बस इतना था कि जहां मंच था, वहां तालियां थीं; जहां सवाल थे, वहां लाठियां थीं।
कार्यक्रम स्थल पर माहौल पूरी तरह नियंत्रित और सजावटी नजर आया। कांग्रेस से जुड़े कुछ कार्यकर्ता दरी बिछाने, स्वागत-सत्कार और व्यवस्था में लगे दिखाई दिए। मुख्यमंत्री के भाषण के दौरान तालियां लगातार बजती रहीं, मानो नगर की हर समस्या उद्घाटन के साथ ही बह गई हो। मंच से देखने पर धनपुरी एक आदर्श नगर प्रतीत हो रहा था—न बेरोजगारी, न दूषित पानी, न अपराध, न असंतोष।
लेकिन इसी चमकते मंच से कुछ कदम दूर सच्चाई ने दूसरी शक्ल दिखाई। कांग्रेस के ब्लॉक अध्यक्ष, मंडल अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष सहित कई कार्यकर्ता बेरोजगारी, दूषित पेयजल, वंश की हत्या जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराने सड़कों पर उतरे। उनका स्वागत फूलों या संवाद से नहीं, बल्कि लाठियों, हिरासत और जेल की दीवारों से हुआ। काले झंडे लोकतंत्र का प्रतीक बने, और पुलिस की लाठी व्यवस्था का उत्तर।
सबसे तीखा कटाक्ष यह रहा कि एक ही पार्टी के कुछ चेहरे मंच पर सत्ता के साथ तालियां बजाते दिखे, जबकि उसी पार्टी के दूसरे चेहरे सड़कों पर विरोध की कीमत चुकाते रहे। धनपुरी में यह दृश्य मानो बता गया कि आज की राजनीति में भूमिका पहले तय होती है—कौन दरी पर बैठेगा और कौन लाठी खाएगा।
नगर में यह सवाल गूंजता रहा कि क्या अब विकास कार्यक्रमों में सिर्फ वही आवाजें स्वीकार्य हैं जो तालियों की लय में हों? क्या जनसमस्याएं केवल भाषणों से बाहर रखी जाने वाली चीज बन चुकी हैं? और क्या लोकतंत्र का मतलब अब केवल कार्यक्रम की शालीनता तक सीमित रह गया है?
धनपुरी का यह लोकार्पण इसलिए याद रखा जाएगा कि यहां केवल वाटर पार्क का उद्घाटन नहीं हुआ, बल्कि यह भी साफ हो गया कि
विकास का मंच सुरक्षित है, लेकिन सवाल आज भी असुरक्षित हैं।
तालियां सत्ता को मिलीं और लाठियां सवाल पूछने वालों को—यही इस “अति विशेष” आयोजन की सबसे बड़ी सीख रही।
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